हरतालिका तीज 2026: तिथि, निर्जला व्रत विधि और पार्वती-कथा

Hartalika Teej · भाद्रपद शुक्ल तृतीया

भाद्रपद शुक्ल तृतीया को मनाई जाने वाली हरतालिका तीज माता पार्वती के कठोर तप और शिव-प्राप्ति के संकल्प का स्मरण कराने वाला निर्जला व्रत है, जिसे विशेषकर विवाहित स्त्रियाँ रखती हैं।

तिथि: 2026-09-14 (सोमवार) पंचांग: भाद्रपद शुक्ल तृतीया नक्षत्र: Chitra आराध्य: पार्वती

हरतालिका तीज क्या है

What is Hartalika Teej

हरतालिका तीज भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाने वाला एक प्रमुख व्रत है, जो मुख्यतः उत्तर भारत, राजस्थान, बिहार और नेपाल के तराई क्षेत्रों में विवाहित स्त्रियों द्वारा रखा जाता है। यह वर्ष की सबसे कठोर उपवास-परंपराओं में गिना जाता है, क्योंकि इसमें पूरे दिन-रात न अन्न लिया जाता है और न ही जल — इसे निर्जला व्रत कहा जाता है।

इस व्रत को माता पार्वती द्वारा शिवजी को पति रूप में पाने के लिए किए गए तप के स्मरण के रूप में देखा जाता है। कुँवारी कन्याएँ मनचाहे वर की कामना से और विवाहित स्त्रियाँ पति की दीर्घायु तथा दांपत्य सुख की कामना से यह व्रत करती हैं। 'हरतालिका' शब्द दो शब्दों — 'हरत' (हरण) और 'आलिका' (सखी) — से मिलकर बना माना जाता है, जो इस कथा से जुड़ा है कि पार्वती की सखियाँ ही उन्हें वन में ले गई थीं।

2026 में हरतालिका तीज की तिथि एवं पंचांग

Date and panchang for 2026

वर्ष 2026 में हरतालिका तीज भाद्रपद शुक्ल तृतीया को, दिनांक 14 सितंबर, सोमवार को मनाई जाएगी। इस दिन चंद्रमा चित्रा नक्षत्र में संचरण करेगा। तृतीया तिथि सूर्योदयकालीन गणना के अनुसार निर्धारित की जाती है, अर्थात जिस दिन सूर्योदय के समय तृतीया तिथि विद्यमान हो, उसी दिन व्रत रखा जाता है।

यह तिथि दिल्ली के सूर्योदय-समय के आधार पर पंचांग-गणना से निकाली गई है। भारत के अलग-अलग हिस्सों के स्थानीय पंचांग में तिथि के आरंभ-समापन में थोड़ा अंतर हो सकता है, इसलिए अपने क्षेत्र के पंचांग या पास के मंदिर से पुष्टि कर लेना उचित रहता है। स्मरण रहे कि इसके अगले ही दिन, भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को गणेश चतुर्थी का पर्व आरंभ होता है, इसलिए दोनों पर्व सामान्यतः लगातार पड़ते हैं।

पौराणिक कथा एवं महत्व

Legend and significance

शिव पुराण और स्कंद पुराण में वर्णित कथा के अनुसार, हिमालय-पुत्री पार्वती ने बचपन से ही शिव को पति रूप में पाने का संकल्प ले लिया था। जब उनके पिता हिमवान ने विष्णुजी के साथ उनका विवाह तय कर दिया, तो पार्वती अत्यंत दुखी हुईं और अपनी सखियों की सहायता से वन में चली गईं, जहाँ उन्होंने घोर तपस्या आरंभ की।

वन में उन्होंने रेत से शिवलिंग बनाकर उसकी पूजा की, बिना अन्न-जल ग्रहण किए वर्षों तक तप किया। कहा जाता है कि इसी अटूट भक्ति और तप से प्रसन्न होकर शिवजी ने पार्वती को पत्नी रूप में स्वीकार किया। मान्यता है कि इसी घटना की स्मृति में स्त्रियाँ इस दिन व्रत रखती हैं, ताकि उन्हें भी वैसा ही अटूट दांपत्य सुख प्राप्त हो। कुछ क्षेत्रों में यह भी माना जाता है कि इसी दिन शिव-पार्वती का विवाह-संकल्प हुआ था, हालाँकि विवाह की मुख्य तिथि परंपरा अनुसार अलग बताई जाती है।

पूजा विधि

Step-by-step puja method

व्रत की तैयारी प्रायः एक दिन पहले से आरंभ होती है, जब स्त्रियाँ स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करती हैं। पूजा-स्थान को स्वच्छ कर वहाँ केले के पत्तों या मंडप से सजाया जाता है, और मिट्टी या रेत से शिव, पार्वती तथा गणेशजी की प्रतिमाएँ बनाई जाती हैं।

पूजन में हल्दी, कुमकुम, चंदन, फूल, बेलपत्र, धतूरा (शिवजी हेतु), श्रृंगार-सामग्री (पार्वती हेतु — चूड़ी, बिंदी, सिंदूर, कंघी) और मिष्ठान अर्पित किए जाते हैं। धूप-दीप जलाकर आरती की जाती है और हरतालिका तीज की कथा सुनी या सुनाई जाती है। रात्रि में जागरण की परंपरा भी कई परिवारों में निभाई जाती है, जिसमें भजन-कीर्तन होता है। अगली सुबह विधिपूर्वक आरती के बाद ही व्रत का पारण किया जाता है, और श्रृंगार-सामग्री सुहागिन स्त्रियों को दान की जाती है।

व्रत एवं नियम

Fasting rules

हरतालिका तीज का व्रत सबसे कठोर व्रतों में गिना जाता है, क्योंकि इसमें पूरे 24 घंटे न अन्न लिया जाता है, न जल — इसे निर्जला-निराहार व्रत कहा जाता है। व्रती स्त्री सूर्योदय से पहले संकल्प लेती है और अगले दिन सूर्योदय के बाद ही पारण करती है।

परंपरा के अनुसार इस दिन सोना वर्जित माना जाता है, इसलिए रात्रि-जागरण की प्रथा प्रचलित है। कुछ परिवारों में एक हल्की-फुल्की परंपरा भी है, जिसमें अत्यंत कठिन स्थिति में स्त्री केवल जल या फलाहार ले सकती है, यह पूरी तरह पारिवारिक रीति और व्यक्ति की क्षमता पर निर्भर करता है — इसमें कोई एक बंधनकारी नियम सबके लिए समान नहीं है। व्रत का संकल्प मन, वचन और कर्म की शुद्धता के साथ लिया जाता है, और माना जाता है कि श्रद्धा-भाव ही इस व्रत का मूल है।

क्षेत्रीय विविधता

Regional variations

उत्तर प्रदेश और बिहार में हरतालिका तीज विशेष उत्साह से मनाई जाती है, जहाँ नवविवाहित स्त्रियों के मायके से 'सिंधारा' के रूप में वस्त्र, श्रृंगार-सामग्री और मिठाइयाँ भेजी जाती हैं। राजस्थान में इसे तीज के त्योहारों की शृंखला में एक महत्वपूर्ण कड़ी माना जाता है, जहाँ झूला झूलने और लोकगीत गाने की परंपरा भी जुड़ी है।

नेपाल के तराई क्षेत्र में यह पर्व 'हरितालिका तीज' नाम से बड़े पैमाने पर मनाया जाता है, जहाँ स्त्रियाँ लाल वस्त्र पहनकर मंदिरों में समूह में नृत्य-गायन करती हैं। कुछ क्षेत्रों में इसे हरियाली तीज या कजरी तीज से भिन्न, स्वतंत्र और अधिक कठोर व्रत के रूप में देखा जाता है, जबकि कुछ अन्य स्थानीय परंपराओं में तीनों तीज-पर्वों को एक ही तीज-शृंखला की कड़ी माना जाता है।

आराध्य देव से संबंध

Connection to Parvati

यह पर्व सीधे माता पार्वती से जुड़ा है, जिन्हें शिवजी की अर्धांगिनी और शक्ति-स्वरूपा माना जाता है। पार्वती को उमा, गौरी, गिरिजा जैसे नामों से भी जाना जाता है, और वे दृढ़ संकल्प, तप तथा अटूट श्रद्धा की प्रतीक मानी जाती हैं।

हरतालिका तीज का पूरा भाव पार्वती के उसी संकल्प से उपजा है, जिसमें उन्होंने कठिन तप के बल पर अपने चुने हुए वर को पाया। इसीलिए यह व्रत स्त्री की आंतरिक शक्ति, धैर्य और श्रद्धा के उत्सव के रूप में देखा जाता है, न कि केवल एक अनुष्ठान के रूप में। पार्वती के इस स्वरूप की पूजा स्त्रियों को यह स्मरण कराती है कि सच्ची भक्ति और संकल्प से आंतरिक बल प्राप्त होता है।

सावधानियाँ एवं व्यावहारिक बातें

Precautions

निर्जला व्रत शरीर के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है, विशेषकर उन लोगों के लिए जो पहले से किसी स्वास्थ्य समस्या से जूझ रहे हों। जो स्त्रियाँ गर्भवती हों, स्तनपान करा रही हों, वृद्ध हों, मधुमेह (डायबिटीज़) से पीड़ित हों, किडनी या हृदय संबंधी समस्या से गुजर रही हों, या किसी नियमित दवा पर निर्भर हों, उन्हें व्रत रखने से पहले अनिवार्य रूप से चिकित्सक से परामर्श लेना चाहिए।

धार्मिक आस्था अपनी जगह है, परंतु यह किसी भी उपचार का विकल्प नहीं बन सकती। यदि चिकित्सक मना करें, तो व्रत का प्रतीकात्मक रूप — जैसे केवल फलाहार या संक्षिप्त संकल्प — अपनाया जा सकता है, क्योंकि परंपरा में भाव और श्रद्धा को नियमों की कठोरता से ऊपर माना गया है। व्रत के दौरान चक्कर आना, अत्यधिक कमजोरी या बेचैनी महसूस होने पर तुरंत जल लेकर चिकित्सकीय सहायता लेनी चाहिए।

प्रतीकात्मक अर्थ

Symbolic meaning

हरतालिका तीज केवल एक अनुष्ठान नहीं, बल्कि दृढ़ संकल्प और आत्म-अनुशासन का प्रतीक है। रेत से बनाई गई शिव-पार्वती की अस्थायी प्रतिमाएँ यह भी स्मरण कराती हैं कि भक्ति का सार बाहरी वैभव में नहीं, बल्कि भीतर की श्रद्धा में है।

निर्जला व्रत का कठोर स्वरूप इस भाव को दर्शाता है कि जो व्यक्ति अपने लक्ष्य के प्रति दृढ़ रहता है, वह कठिनतम परिस्थितियों में भी अडिग रहता है — ठीक वैसे ही जैसे पार्वती अपने तप से विचलित नहीं हुईं। यह पर्व स्त्री-शक्ति, धैर्य और पारस्परिक विश्वास के दांपत्य-मूल्य को भी रेखांकित करता है, जो आज भी इसे प्रासंगिक बनाए रखता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

FAQ

हरतालिका तीज 2026 में कब है?
वर्ष 2026 में हरतालिका तीज भाद्रपद शुक्ल तृतीया को, 14 सितंबर, सोमवार को मनाई जाएगी। यह तिथि दिल्ली के सूर्योदय के आधार पर निकाली गई है, अपने क्षेत्र के पंचांग से एक बार पुष्टि कर लें।

क्या हरतालिका तीज व्रत में पानी पी सकते हैं?
परंपरागत रूप से यह निर्जला व्रत है, अर्थात जल भी नहीं लिया जाता। परंतु स्वास्थ्य-कारणों से चिकित्सक की सलाह पर व्रती जल या फलाहार ले सकती हैं — भाव और श्रद्धा को नियमों की कठोरता से अधिक महत्व दिया जाता है।

हरतालिका तीज व्रत किसे रखना चाहिए?
यह व्रत मुख्यतः विवाहित स्त्रियाँ पति की दीर्घायु और दांपत्य सुख हेतु रखती हैं, और कुँवारी कन्याएँ भी मनचाहे वर की कामना से रख सकती हैं। परंतु बीमार, गर्भवती या वृद्ध व्यक्तियों को पहले डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए।

हरतालिका तीज पूजा में क्या-क्या सामग्री चाहिए?
मिट्टी/रेत की शिव-पार्वती-गणेश प्रतिमाएँ, हल्दी-कुमकुम, चंदन, बेलपत्र, धतूरा, श्रृंगार-सामग्री (चूड़ी, बिंदी, सिंदूर), फल-मिष्ठान और धूप-दीप की आवश्यकता होती है।

हरतालिका तीज का पारण कब किया जाता है?
व्रत का पारण अगले दिन सूर्योदय के बाद, प्रातःकालीन पूजा-आरती संपन्न होने पर किया जाता है। इससे पहले जल या अन्न ग्रहण नहीं किया जाता।

तिथियाँ दिल्ली के सूर्योदय के आधार पर गणित की गई हैं। स्थान बदलने पर तिथि एक दिन आगे-पीछे हो सकती है — अपने स्थानीय पंचांग से मिलान अवश्य कर लें।