खंडोबा कौन हैं — जेजुरी के मल्हारी मार्तंड की कथा और भंडारा परंपरा
Khandoba · Folk-Puranic warrior deity
महाराष्ट्र और कर्नाटक के दक्खन पठार में पूजित खंडोबा, शिव के लोक-अवतार माने जाते हैं। इनका मुख्य धाम जेजुरी है, जहाँ हल्दी के भंडारे और घोड़े पर सवार योद्धा-रूप की परंपरा प्रसिद्ध है।
परिचय — मल्हारी खंडोबा कौन हैं
Introduction to Khandoba
परिचय — मल्हारी खंडोबा कौन हैं
Introduction to Khandobaखंडोबा महाराष्ट्र और कर्नाटक के दक्खन पठार क्षेत्र में व्यापक रूप से पूजित एक लोक-देवता हैं। इन्हें 'मल्हारी मार्तंड' और 'मैलार' जैसे नामों से भी जाना जाता है। परंपरा में इन्हें शिव का ही एक क्षेत्रीय, लोक-पुराणिक अवतार माना गया है, जो विशेष रूप से किसान, धनगर (चरवाहा) और मेहनतकश समुदायों के बीच अत्यंत आदरणीय हैं।
खंडोबा की मूर्ति-कल्पना एक योद्धा देवता के रूप में की जाती है — घोड़े पर सवार, हाथ में खड्ग (जिससे इनका नाम 'खंडोबा' जुड़ा माना जाता है) लिए हुए। इनकी उपासना की सबसे विशिष्ट पहचान 'भंडारा' यानी हल्दी का प्रयोग है, जो इनके मंदिरों और उत्सवों में हर ओर बिखरा दिखाई देता है।
इनका मुख्य धाम जेजुरी है, जो पुणे जिले में स्थित एक पहाड़ी दुर्ग-मंदिर है। इस स्थान को 'सोनयाची जेजुरी' यानी 'सोने की जेजुरी' कहा जाता है — यह नाम भंडारे की सुनहरी आभा से जुड़ा माना जाता है।
नाम एवं स्वरूप
Names and iconography
नाम एवं स्वरूप
Names and iconography'खंडोबा' नाम को 'खंडा' (एक प्रकार की तलवार) से जोड़ा जाता है, जो इनके योद्धा-स्वरूप का प्रतीक है। 'मार्तंड भैरव' नाम इन्हें सूर्य-तत्त्व (मार्तंड) और शिव के भैरव-रूप से जोड़ता है, जबकि 'मैलार' नाम कर्नाटक क्षेत्र में प्रचलित है।
मूर्ति-कल्पना में खंडोबा को घोड़े पर सवार, हाथ में तलवार और कभी-कभी त्रिशूल-डमरू जैसे शैव चिह्नों के साथ दिखाया जाता है। इनके साथ प्रायः श्वान (कुत्ता) भी दर्शाया जाता है, जो इनके वाहन अथवा सहचर के रूप में माना जाता है।
मणि-मल्ल वध की कथा
The tale of Mani-Malla
मणि-मल्ल वध की कथा
The tale of Mani-Mallaखंडोबा से जुड़ी प्रमुख कथा दो असुर भाइयों, मणि और मल्ल, के वध से संबंधित है। मान्यता है कि इन असुरों ने ऋषियों और सामान्य जनजीवन को अत्यंत त्रस्त कर रखा था, जिसके कारण ऋषियों ने शिव से रक्षा की प्रार्थना की।
कथा के अनुसार, शिव ने मार्तंड भैरव के रूप में अवतार लेकर इन असुरों से भीषण युद्ध किया। यह युद्ध छह दिनों तक चला, जिसके पश्चात असुरों का वध हुआ। इसी विजय-स्मृति में जेजुरी में चंपाषष्ठी नामक छह-रात्रि उत्सव मनाया जाता है।
भंडारा — हल्दी की परंपरा
Bhandara — the turmeric tradition
भंडारा — हल्दी की परंपरा
Bhandara — the turmeric traditionखंडोबा उपासना की सबसे विशिष्ट पहचान 'भंडारा' है — यानी हल्दी का चूर्ण, जिसे भक्त एक-दूसरे पर और मंदिर परिसर में उड़ाते हैं। मंदिर के आसपास का पूरा क्षेत्र सुनहरे हल्दी-चूर्ण से आच्छादित दिखाई देता है, जिसके कारण जेजुरी को 'सोने की जेजुरी' कहा जाता है।
परंपरा में भंडारे को विजय और मंगल का प्रतीक माना जाता है। भक्त इसे प्रसाद-स्वरूप घर ले जाते हैं और मान्यता है कि यह शुभता और समृद्धि का प्रतीक है — यह विश्वास श्रद्धा और परंपरा पर आधारित है।
म्हाळसा और बाणाई — दो पत्नियाँ
Mhalsa and Banai
म्हाळसा और बाणाई — दो पत्नियाँ
Mhalsa and Banaiखंडोबा की कथाओं में दो पत्नियों — म्हाळसा और बाणाई — का उल्लेख मिलता है। म्हाळसा को पार्वती का ही रूप माना जाता है, जबकि बाणाई को धनगर (चरवाहा) समुदाय की कन्या बताया गया है।
यह द्विविवाह-कथा खंडोबा परंपरा में सामाजिक विविधता को दर्शाती है — म्हाळसा उच्च-वर्गीय परंपरा से और बाणाई ग्रामीण-चारागाही समुदाय से जुड़ी मानी जाती हैं। इस प्रकार खंडोबा की उपासना विभिन्न सामाजिक वर्गों को एक सूत्र में जोड़ने वाली परंपरा के रूप में देखी जाती है। यह कथा-रूप है, जिसकी विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग व्याख्याएँ भी प्रचलित हैं।
इतिहास और होळकर परंपरा
History and the Holkar connection
इतिहास और होळकर परंपरा
History and the Holkar connectionखंडोबा की उपासना का ऐतिहासिक विस्तार भी उल्लेखनीय है। मराठा साम्राज्य के अनेक शासक और सेनापति, विशेषकर होळकर राजवंश, खंडोबा को अपना कुलदेवता मानते थे और युद्ध-अभियानों से पूर्व इनकी पूजा-अर्चना करते थे।
जेजुरी और अन्य खंडोबा मंदिरों में दीपमाळा (दीप-स्तंभ) की परंपरा भी इसी ऐतिहासिक काल से जुड़ी मानी जाती है, जो आज भी मंदिर स्थापत्य की पहचान बनी हुई है।
एक ईमानदार सुधार-नोट
An honest note on evolving practice
एक ईमानदार सुधार-नोट
An honest note on evolving practiceखंडोबा परंपरा में ऐतिहासिक रूप से कुछ प्रथाएँ प्रचलित रही हैं, जिन्हें समय के साथ सामाजिक सुधार की दृष्टि से पुनर्विचारित किया गया है। परंपरा के जीवंत रूप में सुधार होना स्वाभाविक है, और आधुनिक उपासना पद्धति में भक्ति और सेवा-भाव को केंद्र में रखा जाता है। यह कोश किसी भी ऐसी प्रथा का समर्थन नहीं करता जो व्यक्ति की गरिमा अथवा स्वतंत्र इच्छा के विरुद्ध हो।
मंत्र एवं घोष
Mantra and chants
मंत्र एवं घोष
Mantra and chantsखंडोबा भक्ति में सबसे प्रचलित घोष है — 'येळकोट येळकोट जय मल्हार'। यह घोष मंदिर में और उत्सवों के दौरान सामूहिक रूप से लगाया जाता है, जो भक्तों में उत्साह और श्रद्धा का भाव जगाता है।
'तळी भंडार' नामक विधि में भक्त एक थाली में हल्दी, नारियल और सुपारी रखकर सामूहिक पूजा करते हैं — इसे 'तळी-आरती' भी कहा जाता है, जो खंडोबा उपासना की एक विशिष्ट सामाजिक-धार्मिक विधि मानी जाती है।
पर्व — चंपाषष्ठी
Champa Shashthi festival
पर्व — चंपाषष्ठी
Champa Shashthi festivalखंडोबा का सबसे बड़ा पर्व चंपाषष्ठी है, जो मार्गशीर्ष माह में मनाया जाता है। यह छह दिनों तक चलने वाला उत्सव है, जो मणि-मल्ल वध की विजय-स्मृति में आयोजित होता है। छठे दिन को विशेष रूप से पूजनीय माना जाता है, जब मंदिरों में विशाल भंडारा-उत्सव होता है।
| पर्व | काल |
|---|---|
| चंपाषष्ठी | मार्गशीर्ष शुक्ल षष्ठी (छह-दिवसीय) |
| सोमवती अमावस्या | जेजुरी में विशेष दर्शन-दिवस |
मंदिर एवं क्षेत्र
Temples and region
मंदिर एवं क्षेत्र
Temples and regionखंडोबा का मुख्य मंदिर जेजुरी-गड (पुणे जिला, महाराष्ट्र) में स्थित है। इसके अतिरिक्त कर्नाटक के मैलार-क्षेत्र में भी इनकी व्यापक उपासना होती है, जहाँ इन्हें 'मैलार' नाम से पूजा जाता है। धनगर, किसान और अन्य ग्रामीण समुदायों में खंडोबा को कुलदेवता के रूप में पूजने की परंपरा आज भी जीवंत है।
आधुनिक समय में भी जेजुरी उत्सवों के दौरान लाखों भक्त पहुँचते हैं, और खंडोबा की भंडारा-परंपरा महाराष्ट्र की सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा बनी हुई है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
FAQ
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
FAQखंडोबा किसके अवतार माने जाते हैं?
परंपरा में खंडोबा को शिव का ही एक लोक-पुराणिक अवतार, मार्तंड भैरव के रूप में, माना जाता है। यह मान्यता विशेषकर महाराष्ट्र और कर्नाटक के दक्खन पठार क्षेत्र में प्रचलित है।
खंडोबा का मुख्य मंदिर कहाँ है?
खंडोबा का मुख्य और सबसे प्रसिद्ध मंदिर जेजुरी-गड में स्थित है, जो पुणे जिला, महाराष्ट्र में एक पहाड़ी दुर्ग-मंदिर है। इसे 'सोनयाची जेजुरी' भी कहा जाता है।
भंडारा क्या है और इसका क्या महत्व है?
भंडारा हल्दी के चूर्ण को कहा जाता है, जिसे खंडोबा भक्त मंदिर में और उत्सवों के दौरान उड़ाते हैं। परंपरा में इसे विजय और मंगल का प्रतीक माना जाता है।
चंपाषष्ठी पर्व कब मनाया जाता है?
चंपाषष्ठी मार्गशीर्ष माह की शुक्ल पक्ष में छह दिनों तक मनाया जाने वाला पर्व है, जो मणि-मल्ल असुरों के वध की विजय-स्मृति में आयोजित होता है।
खंडोबा की पत्नियाँ कौन मानी जाती हैं?
कथाओं के अनुसार खंडोबा की दो पत्नियाँ बताई गई हैं — म्हाळसा, जिन्हें पार्वती का रूप माना जाता है, और बाणाई, जो धनगर समुदाय से संबंधित मानी जाती हैं।
'येळकोट' घोष का क्या अर्थ है?
'येळकोट येळकोट जय मल्हार' खंडोबा भक्तों का प्रमुख घोष है, जो श्रद्धा और उत्साह व्यक्त करने के लिए मंदिर तथा उत्सवों में सामूहिक रूप से लगाया जाता है।