ऋषि पंचमी 2026: तिथि, सप्तर्षि पूजन विधि और महत्व

Rishi Panchami · भाद्रपद शुक्ल पंचमी

भाद्रपद शुक्ल पंचमी को मनाई जाने वाली ऋषि पंचमी सप्तर्षियों — सात महान ऋषियों — के सम्मान और शुद्धिकरण के भाव से जुड़ा व्रत है, जो गणेशोत्सव की अवधि में ही पड़ता है।

तिथि: 2026-09-16 (बुधवार) पंचांग: भाद्रपद शुक्ल पंचमी नक्षत्र: Vishakha आराध्य: गणेश

ऋषि पंचमी क्या है

What is Rishi Panchami

ऋषि पंचमी भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाने वाला व्रत है, जो मुख्यतः महाराष्ट्र, कर्नाटक, गुजरात और नेपाल में प्रचलित है। इस दिन सप्तर्षियों — कश्यप, अत्रि, भरद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और वशिष्ठ — का पूजन किया जाता है, जिन्हें वैदिक ज्ञान-परंपरा के मूल स्रोत माना जाता है।

यह व्रत विशेषकर स्त्रियों द्वारा रखा जाता है, और इसका मूल भाव अनजाने में हुए आचार-दोषों से शुद्धि पाने की भावना से जुड़ा माना जाता है। पर्व की तिथि गणेश चतुर्थी के ठीक दो दिन बाद पड़ती है, इसलिए यह गणेशोत्सव की दस-दिवसीय अवधि के भीतर ही आता है और कई परिवार इसे उसी उत्सव-क्रम की एक कड़ी के रूप में मनाते हैं।

2026 में ऋषि पंचमी की तिथि एवं पंचांग

Date and panchang for 2026

वर्ष 2026 में ऋषि पंचमी भाद्रपद शुक्ल पंचमी को, दिनांक 16 सितंबर, बुधवार को मनाई जाएगी, जिस दिन चंद्रमा विशाखा नक्षत्र में रहेगा। पंचमी तिथि का निर्धारण सूर्योदयकालीन गणना से किया जाता है, अर्थात जिस दिन सूर्योदय के समय पंचमी तिथि विद्यमान हो, उसी दिन व्रत रखा और पूजन किया जाता है।

यह तिथि दिल्ली के सूर्योदय-समय के आधार पर निकाली गई है। भारत के विभिन्न क्षेत्रों के स्थानीय पंचांग में तिथि के आरंभ-समापन में मामूली अंतर हो सकता है, इसलिए अपने क्षेत्र के पंचांग या मंदिर से एक बार पुष्टि कर लेना उचित रहता है। यह पर्व गणेश चतुर्थी (14 सितंबर) के दो दिन बाद और गणेशोत्सव की चल रही अवधि में ही पड़ता है।

पौराणिक कथा एवं महत्व

Legend and significance

ऋषि पंचमी की कथा एक ब्राह्मण दंपती से जुड़ी बताई जाती है, जिनकी पुत्री को अनजाने में हुए किसी आचार-दोष के कारण कष्ट भोगना पड़ा। मान्यता है कि सप्तर्षियों के विधिपूर्वक पूजन और व्रत से उस दोष का निवारण हुआ, और तभी से यह परंपरा शुद्धिकरण के भाव से जुड़ी मानी जाती है।

सप्तर्षियों को वैदिक ऋषि-परंपरा के आधारस्तंभ के रूप में देखा जाता है, जिन्होंने वेदों के ज्ञान को सुरक्षित रखा और आगे बढ़ाया। इसीलिए इस दिन उनका स्मरण और पूजन ज्ञान, अनुशासन तथा शुद्ध आचरण के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने के रूप में देखा जाता है। कुछ परंपराओं में सप्तर्षियों के साथ अरुंधती (वशिष्ठ की पत्नी) का भी पूजन किया जाता है, जिन्हें पातिव्रत्य और सतीत्व का प्रतीक माना जाता है।

पूजा विधि

Puja method

ऋषि पंचमी के दिन प्रातःकाल स्नान कर स्वच्छ आसन पर सप्तर्षियों की प्रतीक-रूप में सात छोटे पिंड या चित्र स्थापित किए जाते हैं। कुछ परंपराओं में मिट्टी की सात छोटी आकृतियाँ बनाकर उनका पूजन किया जाता है, जिन्हें हल्दी-कुमकुम, अक्षत, फूल और फल अर्पित किए जाते हैं।

पूजन में धूप-दीप जलाकर सप्तर्षि-स्तवन या संबंधित कथा का पाठ किया जाता है। कई स्थानों पर इस दिन बिना हल से जोते खेत में उगी सब्जियाँ और अनाज ही ग्रहण करने की परंपरा है, जिसे 'ऋषि-भोजन' कहा जाता है। पूजन के अंत में आरती कर प्रसाद वितरण किया जाता है।

व्रत एवं नियम

Fasting rules

ऋषि पंचमी का व्रत परिवार और क्षेत्र की परंपरा के अनुसार भिन्न-भिन्न रूपों में रखा जाता है — कुछ लोग निर्जला व्रत रखते हैं, तो अधिकांश केवल फलाहार लेकर व्रत पूर्ण करते हैं। इस दिन हल से जोती गई फसल की बजाय जंगली या स्वतः उगी सब्जियाँ, कंद-मूल और अनाज ग्रहण करने की परंपरा विशेष रूप से प्रचलित है।

व्रत का संकल्प सूर्योदय से पहले लिया जाता है और सप्तर्षि-पूजन संपन्न होने के बाद ही भोजन ग्रहण किया जाता है। यह व्रत आत्म-शुद्धि और सादगी के भाव से जुड़ा है, इसलिए इस दिन विलासितापूर्ण भोजन या व्यवहार से बचने की सलाह दी जाती है।

क्षेत्रीय विविधता

Regional variations

महाराष्ट्र में ऋषि पंचमी गणेशोत्सव की अवधि में विशेष श्रद्धा से मनाई जाती है, जहाँ स्त्रियाँ सामूहिक रूप से पूजन करती हैं और विशेष 'ऋषि की भाजी' नामक पारंपरिक व्यंजन बनाया जाता है, जिसमें कई प्रकार की कंद-मूल सब्जियाँ मिलाई जाती हैं। कर्नाटक और गुजरात में भी यह व्रत घरेलू स्तर पर प्रचलित है, जहाँ सप्तर्षि-पूजन की विधि स्थानीय परंपरा अनुसार थोड़ी भिन्न हो सकती है।

नेपाल के कुछ हिस्सों में इसे ऋषि तर्पण के साथ जोड़कर मनाया जाता है, जिसमें ऋषियों को जल-अर्पण की परंपरा भी शामिल है। उत्तर भारत के अनेक क्षेत्रों में यह पर्व अपेक्षाकृत कम प्रचलित है और मुख्यतः पारंपरिक परिवारों में ही मनाया जाता है।

आराध्य देव से संबंध

Connection within Ganeshotsav

ऋषि पंचमी का मूल पूजन सप्तर्षियों को समर्पित है, न कि सीधे किसी एक देवता को। परंतु चूँकि यह तिथि गणेश चतुर्थी से आरंभ होने वाले दस-दिवसीय गणेशोत्सव के भीतर ही पड़ती है, इसलिए इस पर्व-कैलेंडर में इसे उसी उत्सव-श्रृंखला की एक कड़ी के रूप में दर्शाया जाता है।

गणेशजी को विघ्नहर्ता और ज्ञान के देवता के रूप में पूजा जाता है, और सप्तर्षि भी वैदिक ज्ञान-परंपरा के संरक्षक माने जाते हैं — इस दृष्टि से दोनों पर्वों में ज्ञान, अनुशासन और शुद्धाचरण के प्रति सम्मान का साझा भाव देखा जा सकता है, भले ही इनके पूजन का स्वरूप भिन्न-भिन्न हो।

सावधानियाँ एवं व्यावहारिक बातें

Precautions

यदि आप निर्जला या निराहार रूप में व्रत रखने का विचार करते हैं, तो यह ध्यान रखें कि जो लोग बीमार हों, गर्भवती हों, स्तनपान करा रही हों, वृद्ध हों, मधुमेह से पीड़ित हों या किसी नियमित दवा पर निर्भर हों, उन्हें व्रत से पहले चिकित्सक से परामर्श अवश्य लेना चाहिए। धार्मिक आस्था किसी भी चिकित्सकीय उपचार का विकल्प नहीं है।

व्रत के दौरान केवल हल्के फलाहार का सेवन एक सुरक्षित विकल्प हो सकता है, और यदि चक्कर आना, कमजोरी या असहजता महसूस हो तो तुरंत जल या हल्का भोजन लेकर आवश्यकता पड़ने पर चिकित्सकीय सहायता लें।

प्रतीकात्मक अर्थ

Symbolic meaning

ऋषि पंचमी अनिवार्य रूप से आत्म-शुद्धि, अनुशासन और ज्ञान-परंपरा के प्रति कृतज्ञता का पर्व है। सप्तर्षियों का पूजन यह स्मरण कराता है कि ज्ञान और सत्य-आचरण की परंपरा कई पीढ़ियों के तप और संयम से आगे बढ़ी है।

हल से न जोती गई भूमि की उपज ग्रहण करने की परंपरा सादगी और प्रकृति के प्रति सम्मान का प्रतीक मानी जाती है। यह पर्व यह भी सिखाता है कि जीवन में शुद्धता केवल बाह्य आचरण से नहीं, बल्कि मन और भाव की स्वच्छता से आती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

FAQ

ऋषि पंचमी 2026 में कब है?
वर्ष 2026 में ऋषि पंचमी भाद्रपद शुक्ल पंचमी को, 16 सितंबर, बुधवार को मनाई जाएगी। यह गणेश चतुर्थी के दो दिन बाद, गणेशोत्सव की चल रही अवधि में पड़ती है।

ऋषि पंचमी पर किन देवताओं का पूजन किया जाता है?
इस दिन सप्तर्षियों — कश्यप, अत्रि, भरद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और वशिष्ठ — का पूजन किया जाता है, कुछ परंपराओं में अरुंधती का भी पूजन शामिल है।

ऋषि पंचमी व्रत में क्या खाया जाता है?
इस दिन हल से न जोती गई भूमि पर उगी सब्जियाँ, कंद-मूल और अनाज ग्रहण करने की परंपरा है, जिसे 'ऋषि-भोजन' कहा जाता है। कई परिवार पूरे दिन फलाहार पर ही रहते हैं।

ऋषि पंचमी क्यों मनाई जाती है?
मान्यता है कि सप्तर्षियों के पूजन से अनजाने में हुए आचार-दोषों की शुद्धि होती है। यह पर्व ज्ञान-परंपरा के संरक्षकों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का दिन भी माना जाता है।

तिथियाँ दिल्ली के सूर्योदय के आधार पर गणित की गई हैं। स्थान बदलने पर तिथि एक दिन आगे-पीछे हो सकती है — अपने स्थानीय पंचांग से मिलान अवश्य कर लें।