धनतेरस 2026: तिथि, पूजा विधि, धन्वंतरि पूजन और खरीदारी मुहूर्त
Dhanteras · आश्विन कृष्ण त्रयोदशी
आश्विन कृष्ण त्रयोदशी को मनाया जाने वाला धनतेरस दीपावली के पर्व-समूह का पहला दिन है, जिसमें देवी लक्ष्मी, भगवान धन्वंतरि और यमराज की पूजा कर स्वास्थ्य, समृद्धि और दीर्घायु की कामना की जाती है।
धनतेरस क्या है
What is Dhanteras
धनतेरस क्या है
What is Dhanterasधनतेरस, जिसे धन त्रयोदशी भी कहा जाता है, आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को मनाया जाता है और यह दीपावली के पाँच दिवसीय पर्व-समूह का प्रथम दिन माना जाता है। इस दिन देवी लक्ष्मी, धन के देवता कुबेर तथा आयुर्वेद के देवता भगवान धन्वंतरि की पूजा की जाती है।
परंपरा के अनुसार इस दिन घर की साफ-सफाई कर मुख्य द्वार को दीपों और रंगोली से सजाया जाता है, तथा नए बर्तन, आभूषण या अन्य वस्तुओं की खरीदारी को शुभ माना जाता है। सायंकाल घर के बाहर यमराज के निमित्त एक दीप जलाने की भी परंपरा है, जिसे यम दीपदान कहा जाता है।
2026 में धनतेरस की तिथि एवं पंचांग
Date and panchang for 2026
2026 में धनतेरस की तिथि एवं पंचांग
Date and panchang for 2026वर्ष 2026 में धनतेरस आश्विन कृष्ण त्रयोदशी को, दिनांक 6 नवंबर, शुक्रवार को मनाया जाएगा, जिस दिन चंद्रमा हस्त नक्षत्र में संचरण करेगा। पूजा का शुभ समय प्रदोष-काल के अनुसार निर्धारित किया जाता है, अर्थात सूर्यास्त के बाद का समय इस पूजा के लिए विशेष रूप से उपयुक्त माना जाता है।
यह तिथि दिल्ली के सूर्योदय-समय के आधार पर पंचांग-गणना से निकाली गई है। भारत के विभिन्न क्षेत्रों में प्रदोष-काल का सटीक समय भिन्न हो सकता है, इसलिए पूजा का शुभ मुहूर्त अपने क्षेत्र के पंचांग या स्थानीय पुरोहित से अवश्य पुष्ट कर लें।
पौराणिक कथा एवं महत्व
Legend and significance
पौराणिक कथा एवं महत्व
Legend and significanceधनतेरस से जुड़ी सबसे प्रचलित कथा भगवान धन्वंतरि के समुद्र-मंथन से प्रकट होने की है। मान्यता है कि समुद्र-मंथन के समय भगवान धन्वंतरि हाथ में अमृत-कलश लिए प्रकट हुए थे, इसीलिए इस तिथि को धन्वंतरि जयंती के रूप में भी मनाया जाता है और आयुर्वेद व स्वास्थ्य से जुड़े लोग इस दिन को विशेष रूप से समर्पित मानते हैं।
एक अन्य लोक-कथा राजा हिम के पुत्र से जुड़ी है, जिसकी मृत्यु का शाप विवाह के चौथे दिन साँप के काटने से होना निश्चित था। कथा के अनुसार उसकी नवविवाहिता पत्नी ने द्वार पर सोने-चाँदी के आभूषण, दीप जलाकर और सारी रात कथा-गीत गाकर मृत्यु के देवता यमराज को द्वार से लौटा दिया, जिससे इस दिन दीपदान और यम-पूजन की परंपरा जुड़ी मानी जाती है।
पूजा विधि
Puja method
पूजा विधि
Puja methodधनतेरस के दिन प्रातःकाल घर की सफाई कर मुख्य द्वार पर रंगोली और दीप सजाए जाते हैं। सायंकाल प्रदोष-काल में देवी लक्ष्मी, भगवान कुबेर और भगवान धन्वंतरि की प्रतिमा या चित्र के समक्ष दीप जलाकर, रोली-चावल, फूल और मिठाई अर्पित की जाती है।
नई वस्तु या धातु की खरीदारी कर उसे भी पूजा-स्थल पर रखकर पूजित किया जाता है। पूजा के अंत में आरती की जाती है और परिवार के सभी सदस्य मिलकर समृद्धि एवं स्वास्थ्य की कामना करते हैं। रात्रि में घर के मुख्य द्वार के बाहर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके यमराज के निमित्त एक दीप जलाया जाता है।
व्रत एवं नियम
Rituals and observances
व्रत एवं नियम
Rituals and observancesधनतेरस पर सामान्यतः कठोर उपवास की परंपरा नहीं है, परंतु कुछ भक्त इस दिन सात्विक भोजन और संयमित आहार का पालन करते हैं। घर की स्वच्छता और मुख्य द्वार की सजावट को इस दिन का अनिवार्य अंग माना जाता है, क्योंकि इसे देवी लक्ष्मी के आगमन की तैयारी के रूप में देखा जाता है।
इस दिन कर्ज लेने या उधार देने से बचने की लोक-मान्यता भी प्रचलित है, तथा नकारात्मक विचारों और विवाद से दूर रहकर सकारात्मक भाव से पूजा करने की सलाह दी जाती है। यह परंपराएँ पूर्णतः लोक-विश्वास पर आधारित हैं।
क्षेत्रीय विविधता
Regional variations
क्षेत्रीय विविधता
Regional variationsउत्तर भारत में धनतेरस पर बर्तन और आभूषण खरीदने की परंपरा प्रमुखता से प्रचलित है, जबकि दक्षिण भारत में इस दिन को अधिकांशतः धन्वंतरि जयंती के रूप में मनाया जाता है, जहाँ आयुर्वेदिक संस्थानों और वैद्यों द्वारा विशेष पूजा-अर्चना आयोजित की जाती है।
महाराष्ट्र में इस दिन को वसुबारस के साथ जोड़कर गौ-पूजन की भी परंपरा है, जबकि गुजरात के व्यापारी समुदाय में इस दिन नए बहीखातों की पूजा की शुरुआत मानी जाती है। इस प्रकार पर्व का मूल भाव समान होते हुए भी क्षेत्रीय रीति-रिवाजों में विविधता देखी जाती है।
आराध्य देव से संबंध
Connection with Lakshmi
आराध्य देव से संबंध
Connection with Lakshmiधनतेरस मुख्य रूप से देवी लक्ष्मी की उपासना से जुड़ा पर्व है, जिन्हें धन, समृद्धि और सौभाग्य की देवी माना जाता है। इसी के साथ भगवान धन्वंतरि की पूजा स्वास्थ्य और दीर्घायु की कामना का प्रतीक मानी जाती है, जिससे यह पर्व भौतिक समृद्धि और शारीरिक स्वास्थ्य, दोनों की प्रार्थना का दिन बन जाता है।
मान्यता है कि धनतेरस पर की गई श्रद्धापूर्ण पूजा से देवी लक्ष्मी अगले दिनों दीपावली की मुख्य पूजा में घर में प्रवेश करने के लिए प्रसन्न होती हैं, इसीलिए इसे दीपावली-पर्व का आवश्यक प्रारंभिक चरण माना जाता है।
सावधानियाँ एवं व्यावहारिक बातें
Precautions and practical notes
सावधानियाँ एवं व्यावहारिक बातें
Precautions and practical notesधनतेरस पर खरीदारी करते समय अपने बजट और वास्तविक आवश्यकता का ध्यान रखना व्यावहारिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, क्योंकि किसी भी वस्तु की खरीद केवल परंपरा के दबाव में नहीं करनी चाहिए। दीप जलाते समय ज्वलनशील वस्तुओं से दूरी बनाए रखें और घर में उचित वेंटिलेशन सुनिश्चित करें।
यह ध्यान रखना भी आवश्यक है कि इस दिन की गई पूजा या खरीदारी से किसी आर्थिक लाभ या स्वास्थ्य-लाभ की निश्चितता नहीं जोड़नी चाहिए, बल्कि इसे श्रद्धा और परंपरा पर आधारित सांस्कृतिक अनुष्ठान के रूप में देखना उचित है।
प्रतीकात्मक अर्थ
Symbolic meaning
प्रतीकात्मक अर्थ
Symbolic meaningधनतेरस केवल भौतिक धन की कामना का पर्व नहीं है, बल्कि यह स्वास्थ्य रूपी धन के महत्व को भी रेखांकित करता है, जो भगवान धन्वंतरि की पूजा से स्पष्ट होता है। यह पर्व सिखाता है कि सच्चा धन तभी सार्थक है जब उसके साथ अच्छा स्वास्थ्य और दीर्घायु भी हो।
यम-दीपदान की परंपरा यह भी दर्शाती है कि अकाल मृत्यु के भय से परे, जीवन के प्रति सजगता और परिवार की सुरक्षा की भावना इस पर्व का एक गहरा प्रतीकात्मक अर्थ है।
तिथि की पुष्टि — दो पंचांग स्रोत
Date verified from two panchangs
तिथि की पुष्टि — दो पंचांग स्रोत
Date verified from two panchangsइस लेख की तिथि और समय दो स्वतंत्र पंचांगों से मिलाए गए हैं (जाँच: 2 अक्टूबर 2026)। सभी समय भारतीय मानक समय में हैं; दूसरे शहरों में मिनटों का अंतर होगा।
- द्रिक पंचांग (drikpanchang.com, नई दिल्ली): धनतेरस शुक्रवार, 6 नवंबर 2026। पूजा मुहूर्त सायं 06:02 से 07:57 तक; प्रदोष काल 05:33 से 08:09 तक; वृषभ काल 06:02 से 07:57 तक। त्रयोदशी तिथि 6 नवंबर प्रातः 10:30 से 7 नवंबर प्रातः 10:47 तक।
- देखो पंचांग (dekhopanchang.com, दिल्ली): धनतेरस शुक्रवार, 6 नवंबर 2026; पूजा (प्रदोष काल) सायं 05:49 से 07:15 तक।
मुहूर्त में अंतर का कारण: द्रिक पंचांग का मुहूर्त प्रदोष काल के भीतर वृषभ काल का है, जबकि देखो पंचांग ने प्रदोष काल की अवधि दी है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
FAQ
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
FAQधनतेरस 2026 में कब है?
वर्ष 2026 में धनतेरस 6 नवंबर, शुक्रवार को आश्विन कृष्ण त्रयोदशी तिथि पर मनाया जाएगा। पूजा का शुभ समय प्रदोष-काल में, अर्थात सूर्यास्त के बाद होता है।
धनतेरस पर किसकी पूजा की जाती है?
इस दिन देवी लक्ष्मी, भगवान कुबेर और आयुर्वेद के देवता भगवान धन्वंतरि की पूजा की जाती है, तथा सायंकाल यमराज के निमित्त दीपदान भी किया जाता है।
धनतेरस पर बर्तन या सोना खरीदना क्यों शुभ माना जाता है?
लोक-मान्यता के अनुसार धनतेरस पर की गई नई वस्तु की खरीदारी समृद्धि और सौभाग्य का प्रतीक मानी जाती है, हालांकि खरीदारी का निर्णय हमेशा अपने बजट और आवश्यकता के अनुसार ही लेना चाहिए।
यम दीपदान क्या है और यह कब किया जाता है?
यम दीपदान धनतेरस की रात्रि में घर के मुख्य द्वार के बाहर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके जलाया जाने वाला दीप है, जिसे यमराज के निमित्त अकाल मृत्यु से सुरक्षा की कामना के साथ जलाया जाता है।
धनतेरस दीपावली से कैसे जुड़ा है?
धनतेरस दीपावली के पाँच दिवसीय पर्व-समूह का पहला दिन है, जिसके बाद नरक चतुर्दशी (छोटी दिवाली), दीपावली (लक्ष्मी पूजन), गोवर्धन पूजा और भाई दूज क्रमशः आते हैं।
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तिथियाँ दिल्ली के सूर्योदय के आधार पर गणित की गई हैं। स्थान बदलने पर तिथि एक दिन आगे-पीछे हो सकती है — अपने स्थानीय पंचांग से मिलान अवश्य कर लें।