शरद पूर्णिमा 2026: तिथि, खीर व्रत और कोजागरी पूजन विधि

Sharad Purnima · आश्विन शुक्ल पूर्णिमा
आश्विन शुक्ल पूर्णिमा को मनाई जाने वाली शरद पूर्णिमा देवी लक्ष्मी के कोजागरी पूजन और पूर्ण चंद्रमा की किरणों में खीर रखने की परंपरा के लिए जानी जाती है, जिसे वर्ष की सर्वाधिक शीतल एवं शुभ रात्रि माना जाता है।
शरद पूर्णिमा क्या है
What is Sharad Purnima
शरद पूर्णिमा क्या है
What is Sharad Purnimaशरद पूर्णिमा आश्विन माह की पूर्णिमा तिथि को मनाई जाती है और इसे वर्षभर की सबसे उज्ज्वल एवं शीतल पूर्णिमा माना जाता है, जिस रात चंद्रमा अपनी सोलह कलाओं में पूर्ण होकर सर्वाधिक निकट और तेजस्वी दिखाई देता है। इसी कारण इसे 'कोजागरी पूर्णिमा' भी कहा जाता है।
इस रात्रि देवी लक्ष्मी की विशेष पूजा की जाती है और चंद्र-किरणों में खीर रखकर उसे प्रसाद रूप में ग्रहण करने की परंपरा है। विजयादशमी के पाँच दिन बाद आने वाली यह पूर्णिमा शरद ऋतु के आगमन और वर्षा ऋतु के समापन का भी प्रतीक मानी जाती है।
2026 में शरद पूर्णिमा की तिथि एवं पंचांग
Date and panchang for 2026
2026 में शरद पूर्णिमा की तिथि एवं पंचांग
Date and panchang for 2026वर्ष 2026 में शरद पूर्णिमा आश्विन शुक्ल पूर्णिमा को, दिनांक 26 अक्टूबर, सोमवार को मनाई जाएगी, जिस दिन चंद्रमा अश्विनी नक्षत्र में रहेगा। पूर्णिमा तिथि सूर्योदयकालीन गणना के अनुसार निर्धारित की जाती है।
यह तिथि दिल्ली के सूर्योदय-समय के आधार पर पंचांग-गणना से निकाली गई है। भारत के अलग-अलग क्षेत्रों के पंचांग में तिथि और खीर रखने के सटीक समय में मामूली अंतर हो सकता है, इसलिए अपने क्षेत्र के पंचांग या मंदिर से पुष्टि कर लेना उचित रहता है।
पौराणिक कथा एवं महत्व
Legend and significance
पौराणिक कथा एवं महत्व
Legend and significanceमान्यता है कि शरद पूर्णिमा की रात्रि स्वयं देवी लक्ष्मी पृथ्वी पर भ्रमण करती हैं और पूछती हैं 'को जागर्ति' अर्थात 'कौन जाग रहा है'। जो भक्त इस रात जागकर श्रद्धापूर्वक उनकी आराधना करते हैं, उन पर देवी की विशेष कृपा मानी जाती है — इसी शब्द से इस पूर्णिमा का नाम 'कोजागरी' पड़ा बताया जाता है।
श्रीमद्भागवत पुराण में इस रात्रि को भगवान कृष्ण की रास-लीला से भी जोड़ा जाता है, जिसके अनुसार वृंदावन में इसी शरद-रात्रि को श्रीकृष्ण ने गोपियों के साथ महारास किया था। इस प्रकार यह रात्रि लक्ष्मी-आराधना और कृष्ण-भक्ति, दोनों परंपराओं से जुड़ी मानी जाती है।
पूजा एवं खीर विधि
Puja and kheer ritual
पूजा एवं खीर विधि
Puja and kheer ritualशरद पूर्णिमा की संध्या को देवी लक्ष्मी और भगवान विष्णु या गणेश जी की पूजा की जाती है, जिसमें सफेद पुष्प, चावल की खीर और फल अर्पित किए जाते हैं। पूजा के बाद रात्रि में चावल, दूध और चीनी से बनी खीर को खुले आकाश के नीचे चांदनी में रखा जाता है, जिसे चंद्रमा की अमृतमयी किरणों से युक्त माना जाता है।
रात्रि-जागरण के बाद, प्रायः मध्यरात्रि के पश्चात, इस चंद्र-किरण युक्त खीर को प्रसाद रूप में परिवार के साथ ग्रहण किया जाता है। कुछ स्थानों पर इसे स्वास्थ्यवर्धक भी माना जाता है, क्योंकि आयुर्वेद में इस रात्रि की चंद्र-किरणों को विशेष औषधीय गुणों से युक्त बताया गया है।
कई परिवार इस रात्रि में सत्यनारायण कथा का भी आयोजन करते हैं, जिसे सुनने से पारिवारिक सुख-शांति में वृद्धि होने की मान्यता है। इस तरह पूजा, कथा-श्रवण और खीर-प्रसाद मिलकर इस रात्रि को एक पूर्ण पारिवारिक अनुष्ठान बना देते हैं।
रात्रि-जागरण एवं व्रत
Night vigil and observance
रात्रि-जागरण एवं व्रत
Night vigil and observanceकोजागरी व्रत में भक्त रातभर जागकर भजन-कीर्तन, लक्ष्मी-स्तोत्र पाठ और ध्यान में समय व्यतीत करते हैं, यह मानते हुए कि देवी लक्ष्मी जागृत भक्तों को ही अपनी कृपा प्रदान करती हैं। कुछ परिवार इस दिन उपवास भी रखते हैं और रात्रि-पूजा के बाद ही अन्न ग्रहण करते हैं।
बंगाल में यह व्रत विशेष रूप से गृहस्थ स्त्रियों द्वारा घर की समृद्धि और सुख-शांति की कामना से रखा जाता है, जबकि उत्तर भारत के अनेक क्षेत्रों में यह मुख्यतः खीर बनाने और चंद्र-दर्शन तक सीमित रहता है।
क्षेत्रीय विविधता
Regional variations
क्षेत्रीय विविधता
Regional variationsपश्चिम बंगाल और ओडिशा में शरद पूर्णिमा को 'कोजागरी लक्ष्मी पूजा' के रूप में बड़े स्तर पर मनाया जाता है, जो दुर्गा पूजा के बाद का प्रमुख पर्व माना जाता है। ब्रज क्षेत्र, विशेषकर वृंदावन और मथुरा में इस रात्रि को श्रीकृष्ण की रास-लीला से जोड़कर विशेष उत्सव मनाया जाता है।
पश्चिम भारत के कुछ क्षेत्रों में इसे 'शरद उत्सव' के रूप में मनाया जाता है, जबकि दक्षिण भारत में इस पूर्णिमा का सार्वजनिक उत्सव अपेक्षाकृत सीमित है और इसे मुख्यतः पारिवारिक पूजा तक रखा जाता है।
आराध्य देव से संबंध
Connection to Lakshmi
आराध्य देव से संबंध
Connection to Lakshmiशरद पूर्णिमा मुख्यतः देवी लक्ष्मी के धन, ऐश्वर्य और सौभाग्य प्रदान करने वाले स्वरूप की आराधना से जुड़ी है। इस रात्रि उनके पृथ्वी-भ्रमण की मान्यता यह दर्शाती है कि समृद्धि उन्हीं के घर आती है जो श्रद्धा, जागरूकता और सतर्कता के साथ जीवन जीते हैं।
देवी लक्ष्मी को विष्णु की शाश्वत संगिनी माना जाता है, और उनकी कृपा को केवल धन तक सीमित न मानकर सुख, स्वास्थ्य और मानसिक शांति से भी जोड़ा जाता है, जिसकी कामना इस रात्रि विशेष रूप से की जाती है।
देवी लक्ष्मी के साथ इस दिन भगवान गणेश की भी पूजा की जाती है, क्योंकि विघ्नहर्ता की उपस्थिति के बिना समृद्धि-आराधना अधूरी मानी जाती है। यह परंपरा यह दर्शाती है कि धन-प्राप्ति के साथ बुद्धि और विवेक का संतुलन भी उतना ही आवश्यक है।
सावधानियाँ एवं व्यावहारिक बातें
Precautions and practical points
सावधानियाँ एवं व्यावहारिक बातें
Precautions and practical pointsखुले आकाश में खीर रखते समय उसे धूल, कीड़े-मकोड़ों और प्रदूषण से बचाने के लिए बारीक जालीदार कपड़े से ढककर रखें। जिन क्षेत्रों में वायु-प्रदूषण अधिक हो, वहाँ खीर को अधिक देर खुला न छोड़ें।
रात्रि-जागरण के दौरान बच्चों, वृद्धों और बीमार व्यक्तियों को अनावश्यक रूप से देर रात जगाए रखने से बचें, तथा जो लोग उपवास रख रहे हों और मधुमेह या किसी अन्य स्वास्थ्य समस्या से ग्रस्त हों, उन्हें व्रत से पहले चिकित्सक से परामर्श लेना चाहिए।
प्रतीकात्मक अर्थ
Symbolic meaning
प्रतीकात्मक अर्थ
Symbolic meaningशरद पूर्णिमा की पूर्ण चंद्रमा-कलाएँ यह प्रतीक मानी जाती हैं कि निरंतर साधना और धैर्य से जीवन में भी पूर्णता प्राप्त की जा सकती है। 'को जागर्ति' का प्रश्न यह भी सिखाता है कि समृद्धि और सौभाग्य केवल उन्हीं के पास ठहरते हैं जो जीवन में सजग और सक्रिय रहते हैं, आलस्य में डूबे नहीं।
चंद्र-किरणों में रखी खीर यह भी दर्शाती है कि प्रकृति की शीतलता और मिठास को श्रद्धापूर्वक ग्रहण करने से जीवन में संतुलन और शांति आती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
FAQ
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
FAQशरद पूर्णिमा 2026 में कब है?
वर्ष 2026 में शरद पूर्णिमा आश्विन शुक्ल पूर्णिमा को, 26 अक्टूबर, सोमवार को मनाई जाएगी, जब चंद्रमा अपनी सोलह कलाओं में पूर्ण माना जाता है।
शरद पूर्णिमा को कोजागरी पूर्णिमा क्यों कहा जाता है?
मान्यता है कि इस रात्रि देवी लक्ष्मी पृथ्वी पर भ्रमण करते हुए पूछती हैं 'को जागर्ति' अर्थात कौन जाग रहा है, इसी कारण इसे कोजागरी पूर्णिमा कहा जाता है।
खीर को चंद्रमा की किरणों में क्यों रखा जाता है?
मान्यता है कि शरद पूर्णिमा की चंद्र-किरणों में विशेष अमृतमयी गुण होते हैं, इसलिए चावल-दूध की खीर को रात्रि में खुले आकाश के नीचे रखकर प्रसाद रूप में ग्रहण किया जाता है।
क्या शरद पूर्णिमा और कोजागरी पूर्णिमा अलग-अलग पर्व हैं?
नहीं, दोनों एक ही आश्विन पूर्णिमा तिथि के अलग-अलग नाम हैं। सामान्य बोलचाल में इसे शरद पूर्णिमा और लक्ष्मी-पूजन परंपरा में कोजागरी पूर्णिमा कहा जाता है।
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तिथियाँ दिल्ली के सूर्योदय के आधार पर गणित की गई हैं। स्थान बदलने पर तिथि एक दिन आगे-पीछे हो सकती है — अपने स्थानीय पंचांग से मिलान अवश्य कर लें।