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ग्रह-वार व्रत चक्र: सात दिनों के देवता, व्रत और पूजा नियम

Study guide — ग्रह-वार व्रत चक्र: सात दिनों के देवता, व्रत और पूजा नियम
By Aniket Bhardwaj · 8 नवंबर 2026 · Gods & Deities Blog

इस लेख में आप जानेंगे कि सप्ताह का हर दिन किस ग्रह और किन देवता से जुड़ा माना जाता है।
साथ में यह भी समझेंगे कि वार का व्रत कैसे रखा जाता है और किन बातों का ध्यान रखना चाहिए।

संक्षेप में: परंपरा में सप्ताह के सात वार सात ग्रहों के नाम पर हैं: रवि, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र और शनि। हर वार के साथ एक या अधिक देवता की उपासना जुड़ी है। व्रत एक वार से शुरू करें, नियम सरल रखें और अपनी क्षमता के अनुसार निभाएँ।

वार और ग्रह का संबंध

हिंदी में सप्ताह के दिनों के नाम सीधे ग्रहों से बने हैं। रविवार सूर्य का, सोमवार चंद्र का, मंगलवार मंगल का, बुधवार बुध का, गुरुवार बृहस्पति का, शुक्रवार शुक्र का और शनिवार शनि का दिन है। इसीलिए इसे ग्रह-वार कहा जाता है।

पंचांग में वार दिन का पहला अंग है। पंचांग के पाँचों अंग शहर के सूर्योदय से गिने जाते हैं। इसलिए व्रत वाला वार सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक माना जाता है। रात बारह बजे दिन बदलने वाला नियम यहाँ नहीं चलता।

यह भी याद रखिए कि ग्रह का व्रत और देवता का व्रत एक ही चीज़ नहीं है। परंपरा में वार का संबंध ग्रह से जोड़ा जाता है, पर पूजा देवता की होती है। उदाहरण के लिए, शनिवार को शनि के साथ हनुमान जी की उपासना भी प्रचलित है। यह भिन्नता अलग-अलग परंपराओं और क्षेत्रों की देन है।

सात वार, सात ग्रह, सात देवता

नीचे की तालिका में प्रचलित मान्यताएँ सरल रूप में रखी हैं। आपके परिवार या क्षेत्र की परंपरा इससे कुछ अलग हो सकती है। ऐसे में अपने घर की परंपरा को प्राथमिकता दीजिए।

वारग्रहप्रचलित उपास्य देवताव्रत की सामान्य परंपरा
रविवारसूर्यसूर्य देवसूर्योदय पर जल अर्पण, सादा भोजन
सोमवारचंद्रशिवदिन में उपवास, संध्या को शिव पूजा
मंगलवारमंगलहनुमानहनुमान जी की पूजा, सात्विक आहार
बुधवारबुधगणेश, विष्णुगणेश पूजन, हरी वस्तुओं का प्रचलन
गुरुवारबृहस्पतिविष्णुविष्णु पूजा, पीले रंग का प्रचलन
शुक्रवारशुक्रलक्ष्मी और देवीलक्ष्मी या देवी की पूजा, सात्विक भोजन
शनिवारशनिशनि देव, हनुमानसादा भोजन, दान और सेवा पर ज़ोर

रंग और भोजन के नियम घर-घर में बदलते हैं। इसलिए तालिका को रूपरेखा समझिए, कठोर नियम नहीं।

रविवार, सोमवार और मंगलवार

रविवार। यह सूर्य का दिन है। सूर्य को प्रकाश और ऊर्जा का स्रोत माना जाता है। सूर्योदय पर जल अर्पण करना सबसे सरल उपासना है। सूर्य-उपासना का एक बड़ा पर्व छठ पूजा है, जो 2026 में रविवार, 15 नवंबर को है। यह तिथि हमारे पर्व एवं व्रत पृष्ठ पर दी गई है।

सोमवार। यह चंद्र का दिन है और शिव से जुड़ा माना जाता है। शिव का पंचाक्षर मंत्र "ॐ नमः शिवाय" है। शैव परंपरा में इसे सबसे मूल, केंद्रीय मंत्र कहा गया है। सोमवार का व्रत रखने वाले इसी मंत्र से पूजा करते हैं। नया मंत्र गढ़ने की ज़रूरत नहीं है। जो मंत्र प्रमाणित है, वही पर्याप्त है।

मंगलवार। यह मंगल ग्रह का दिन है और हनुमान जी की उपासना के लिए प्रसिद्ध है। गणेश संकष्टी, यानी अंगारकी चतुर्थी, के बारे में हमारे स्रोत में लिखा है कि वह मंगलवार को पड़े तो उसका विशेष महत्व माना जाता है। इसलिए गणेश के भक्तों के लिए भी मंगलवार का एक अलग स्थान है।

बुधवार, गुरुवार, शुक्रवार और शनिवार

बुधवार। यह बुध ग्रह का दिन है। गणेश को विघ्नहर्ता और बुद्धिदाता कहा जाता है, इसलिए बुधवार को गणेश पूजन की परंपरा चली आई है। गणेश का मूल मंत्र "ॐ गं गणपतये नमः" है। विद्यार्थी और कोई नया काम शुरू करने वाले लोग इस दिन गणेश का स्मरण करते हैं।

गुरुवार। यह बृहस्पति का दिन है और विष्णु की उपासना से जुड़ा है। विष्णु का अष्टाक्षर मंत्र "ॐ नमो नारायणाय" वैष्णव परंपरा में बहुत प्रचलित है। हर चंद्रमास की दोनों एकादशी तिथियाँ भी विष्णु को समर्पित हैं। इसलिए वैष्णव भक्त गुरुवार और एकादशी, दोनों को महत्व देते हैं।

शुक्रवार। यह शुक्र ग्रह का दिन है। लक्ष्मी को श्री और समृद्धि की देवी माना जाता है। शुक्रवार को लक्ष्मी या देवी की पूजा करने की परंपरा है। इस वर्ष धनतेरस शुक्रवार, 6 नवंबर 2026 को पड़ी। लक्ष्मी-गणेश पूजन आज, रविवार 8 नवंबर 2026 को है।

शनिवार। यह शनि का दिन है। परंपरा में शनि को न्याय और कर्मफल से जोड़ा जाता है। इस दिन सादा भोजन, दान और ज़रूरतमंद की सेवा पर ज़ोर दिया जाता है। हनुमान जी की उपासना भी इसी दिन की जाती है। माना जाता है कि सेवा और संयम इस दिन की असली साधना है।

वार का व्रत शुरू करने का तरीका

व्रत का मतलब केवल भूखा रहना नहीं है। इसका अर्थ है संकल्प लेकर एक नियम निभाना। नीचे के क्रम को आप सीधे अपना सकते हैं।

  1. एक वार चुनिए। पहले दिन सातों वार के व्रत न उठाइए। जिस देवता में आपकी श्रद्धा है, उसी का वार चुनिए।
  2. सूर्योदय का समय देखिए। वार सूर्योदय से बदलता है। अपने शहर का पंचांग देखकर ही व्रत का दिन तय कीजिए।
  3. स्नान के बाद संकल्प लीजिए। मन में सोचिए कि आज आप किस देवता का व्रत रख रहे हैं और कौन सा एक नियम निभाएँगे।
  4. पूजा सरल रखिए। दीपक जलाइए, फूल या जल अर्पित कीजिए और प्रमाणित मंत्र का जप कीजिए। लंबी विधि से अधिक मन की एकाग्रता मायने रखती है।
  5. दिन भर नियम निभाइए। सात्विक आहार लीजिए, झूठ से बचिए और किसी की सेवा या दान कीजिए।
  6. व्रत अपनी क्षमता से रखिए। जिन्हें स्वास्थ्य संबंधी कोई समस्या हो, वे अपने चिकित्सक की सलाह से ही उपवास कीजिए। फलाहार या हल्के नियम भी अपनाए जाते हैं। परंपरा श्रद्धा को कठोरता से ऊपर रखती है।
उदाहरण: मान लीजिए आप सोमवार का व्रत शुरू करना चाहते हैं। रविवार रात को अपने शहर का सूर्योदय समय देख लीजिए। सोमवार सुबह स्नान करके शिव के सामने दीपक जलाइए। संकल्प लीजिए कि आज दिन भर सात्विक भोजन करेंगे और झूठ नहीं बोलेंगे। शाम को "ॐ नमः शिवाय" का जप कीजिए। अगले सोमवार भी यही क्रम दोहराइए। शुरुआत में चार सोमवार तक निभाने का लक्ष्य रखना ठीक रहता है।

पंचांग और पर्व पृष्ठ का उपयोग

हमारे ज्ञानकोश के पर्व एवं व्रत पृष्ठ पर एक अलग खंड है, जिसका नाम "ग्रह-वार व्रत-चक्र" है। वहाँ से आप वार के व्रतों की परंपरा देख सकते हैं। उसी पृष्ठ पर नवरात्रि, करवा चौथ, धनतेरस और दीपावली जैसे पर्व भी तिथि और विधि के साथ मिलते हैं।

आज का पंचांग पृष्ठ आपको तारीख और शहर चुनने देता है। वह उस शहर के सूर्योदय से वार, तिथि, नक्षत्र, योग और करण दिखाता है। साथ में राहु काल, यमगण्ड और गुलिक काल जैसे अशुभ काल भी बताता है। पूजा का समय तय करते समय यह पृष्ठ काम आता है। वहाँ "नवग्रह" का खंड भी है।

एक बात और। तिथियों के लिए हम दो पंचांगों का मिलान करते हैं, फिर भी क्षेत्र के अनुसार तिथि में अंतर आ सकता है। अपने स्थानीय पंचांग या पुरोहित से पुष्टि कर लेना अच्छा है।

व्रत रखते समय सामान्य भूलें

मुख्य बातें

  • सप्ताह के सात वार सात ग्रहों के नाम पर हैं, और हर वार के साथ कोई देवता जुड़ा माना जाता है।
  • पंचांग में वार सूर्योदय से बदलता है, इसलिए व्रत का समय सूर्योदय से तय कीजिए।
  • एक वार और एक नियम से शुरुआत कीजिए, सब कुछ एक साथ नहीं।
  • केवल प्रमाणित मंत्रों का जप कीजिए और अपने क्षेत्र की परंपरा का सम्मान कीजिए।
  • व्रत अपनी क्षमता के अनुसार रखिए, श्रद्धा कठोरता से बड़ी है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

ग्रह-वार व्रत कौन सा वार चुनकर शुरू करें?

जिस देवता में आपकी श्रद्धा हो, उसका वार चुनिए। शिव में आस्था हो तो सोमवार, हनुमान में हो तो मंगलवार, विष्णु में हो तो गुरुवार। परिवार में कोई वार पहले से निभाया जाता हो, तो उसी से शुरू करना सहज रहता है।

क्या वार का व्रत ग्रह की शांति के लिए रखा जाता है?

परंपरा में माना जाता है कि वार का संबंध ग्रह से है और पूजा देवता की होती है। फिर भी इससे किसी निश्चित परिणाम की आशा नहीं बाँधनी चाहिए। इसे संयम और भक्ति का अभ्यास मानकर रखिए।

व्रत का वार कब से कब तक माना जाता है?

पंचांग के अनुसार वार सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक चलता है। सूर्योदय का समय शहर के हिसाब से बदलता है। इसलिए अपने शहर का पंचांग देखकर समय तय कीजिए।

पूजा के लिए कौन सा मंत्र जपें?

प्रमाणित और सरल मंत्र चुनिए। शिव के लिए "ॐ नमः शिवाय", गणेश के लिए "ॐ गं गणपतये नमः" और विष्णु के लिए "ॐ नमो नारायणाय" परंपरा में प्रचलित हैं। अपने गुरु या परिवार की परंपरा हो तो उसे प्राथमिकता दीजिए।

अगर किसी दिन व्रत छूट जाए तो क्या करें?

चिंता न कीजिए। अगले सप्ताह उसी वार से फिर शुरू कीजिए। परंपरा श्रद्धा और नियमितता को महत्व देती है, पूर्णता के डर को नहीं।

आगे क्या करें। अपनी जगह के अनुसार समय देखने के लिए नीचे का पेज खोलें।

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