लहंगा-चोली-दुपट्टा
घेरदार लंबी स्कर्ट (लहंगा/घाघरा), ब्लाउज़ (चोली) और दुपट्टा। उत्तर और पश्चिम भारत में आज की सबसे प्रचलित दुल्हन पोशाक। चुनते समय वज़न ज़रूर देखें — भारी कढ़ाई वाला लहंगा कई घंटे की विधि में थका सकता है।
WEDDING WEAR & TEXTILES
बनारसी से कांजीवरम, शेरवानी से मुंडु, ज़रदोज़ी से फुलकारी — भारतीय विवाह के वस्त्र, उनकी पहचान, असली की परख और देखभाल।
01दुल्हन
घेरदार लंबी स्कर्ट (लहंगा/घाघरा), ब्लाउज़ (चोली) और दुपट्टा। उत्तर और पश्चिम भारत में आज की सबसे प्रचलित दुल्हन पोशाक। चुनते समय वज़न ज़रूर देखें — भारी कढ़ाई वाला लहंगा कई घंटे की विधि में थका सकता है।
पूर्व, दक्षिण और पश्चिम भारत में दुल्हन की मुख्य पोशाक। लपेटने की शैली क्षेत्रीय पहचान है — मराठी नऊवारी, तमिल मडिसार, बंगाली आटपौरे, गुजराती सीधा पल्ला।
कुर्ती के साथ चौड़े पैर वाला पायजामा (गरारा में घुटने पर जोड़)। लखनऊ और हैदराबाद की मुस्लिम परंपराओं से जुड़ी पोशाक, आज मेहंदी-संगीत में भी लोकप्रिय।
परंपरा: हल्दी में पीला, मेहंदी में हरा, विवाह में लाल/मैरून (उत्तर भारत), बंगाल-गुजरात में सफ़ेद/क्रीम पर लाल किनारी, केरल में ऑफ़-व्हाइट कसवु। आज कई दुल्हनें पेस्टल रंग भी चुनती हैं — यह व्यक्तिगत पसंद है।
02साड़ियाँ
'GI पंजीकृत' का अर्थ है कि यह नाम भारत के भौगोलिक संकेतक रजिस्ट्री में दर्ज है। स्रोत: GI रजिस्ट्री, भारत सरकार।
वाराणसी (उत्तर प्रदेश) की रेशमी ब्रोकेड साड़ी, जिसमें ज़री (धातु के धागे) से बूटे, बेल और जाल बुने जाते हैं। उत्तर भारत और बंगाल में दुल्हन की सबसे प्रचलित साड़ी। प्रकार: कटान, कढ़ुआ, जंगला, तनछोई, ऑर्गेंज़ा।
तमिलनाडु के कांचीपुरम की भारी शहतूत-रेशम साड़ी। पहचान: 'कोरवाई' तकनीक — किनारी और पल्लू अलग बुनकर मुख्य भाग से गुँथे जाते हैं; मंदिर, मोर, हाथी के मोटिफ़ और विपरीत रंग की किनारी।
महाराष्ट्र (पैठण; आज येवला भी प्रमुख केंद्र) की रेशम-ज़री साड़ी, टेपेस्ट्री जैसी बुनाई से बना मोर और कमल वाला पल्लू। मराठी दुल्हनों की पारंपरिक पसंद।
गुजरात के पाटण की 'डबल इकत' रेशम साड़ी — ताना और बाना दोनों बुनाई से पहले बाँधकर रंगे जाते हैं, इसलिए डिज़ाइन दोनों ओर एक जैसा दिखता है। बहुत श्रमसाध्य और महँगी।
बंधनी गुजरात और राजस्थान की बाँधकर-रंगने (tie-dye) की कला है। 'घरचोला' गुजराती दुल्हन की लाल-हरी बंधनी साड़ी है जिसमें ज़री से चौकोर खाने बुने होते हैं; यह ससुराल की ओर से दी जाती है।
पश्चिम बंगाल (बिष्णुपुर) की रेशम साड़ी जिसके पल्लू पर पौराणिक और ऐतिहासिक कथाओं के दृश्य बुने जाते हैं।
केरल की ऑफ़-व्हाइट हथकरघा साड़ी या सेट-मुंडु, सुनहरी ज़री किनारी के साथ — केरल के हिन्दू विवाहों में दुल्हन की पारंपरिक पोशाक।
असम का सुनहरा प्राकृतिक रेशम — मूगा — जिससे असमिया दुल्हन की मेखेला-चादर बनती है।
तेलंगाना की इकत बुनाई, ज्यामितीय डिज़ाइन के लिए प्रसिद्ध; रेशम और सूती दोनों में।
03दूल्हा
घुटने तक या उससे लंबा कोट, चूड़ीदार या धोती के साथ। उत्तर भारत में दूल्हे की सबसे प्रचलित पोशाक।
शेरवानी जैसा पर आमतौर पर हल्का और पतला कोट; राजस्थान और उत्तर भारत में प्रचलित।
बंद गले का छोटा कोट, पैंट या जोधपुरी ब्रीचेस के साथ — रिसेप्शन के लिए लोकप्रिय।
बंगाल, ओड़िशा, दक्षिण भारत और केरल में विवाह-विधि की पारंपरिक पोशाक, अंगवस्त्रम् या कुर्ते के साथ।
साफ़ा या पगड़ी सम्मान का प्रतीक है; लहरिया और बंधेज साफ़े राजस्थान की पहचान हैं। सेहरा फूलों या मोतियों का पर्दा है; कलगी पगड़ी पर लगने वाला आभूषण।
हाथ से बने चमड़े के जूते, अक्सर कढ़ाई वाले। नए जूते शादी से पहले कुछ दिन पहनकर ढीले कर लें।
04हस्तशिल्प
ज़री सोने/चाँदी के रंग का धातु धागा है जो बुनाई (जैसे बनारसी) और कढ़ाई में इस्तेमाल होता है। ज़रदोज़ी ज़री, सलमा-सितारे और मोतियों की भारी कढ़ाई है — लखनऊ, आगरा, भोपाल और दिल्ली इसके जाने-माने केंद्र हैं।
'असली ज़री' में चाँदी के धागे पर सोने की परत होती है; 'टेस्टेड ज़री' में ताँबे पर; और 'मेटैलिक/प्लास्टिक ज़री' सस्ती नकल है। दुकानदार से बिल पर ज़री का प्रकार लिखवाएं।
लखनऊ की बारीक सफ़ेद धागे वाली कढ़ाई (आज रंगीन भी), हल्के सूती, जॉर्जेट या मलमल पर। 'लखनऊ चिकन क्राफ़्ट' GI पंजीकृत है। मेहंदी, हल्दी और गर्मी के विवाहों के लिए लोकप्रिय।
पंजाब की रेशमी धागे वाली कढ़ाई ('फूलों का काम'), जिसमें कपड़े के उल्टी ओर से डार्निंग टाँके से ज्यामितीय फूल बनते हैं। परंपरागत रूप से दुल्हन को फुलकारी या 'बाग़' (पूरा भरा हुआ) दुपट्टा दिया जाता था। GI पंजीकृत।
बंगाल और ओड़िशा की 'रनिंग स्टिच' कढ़ाई, मूल रूप से पुरानी साड़ियों की परतों को सिलकर बनाई जाती थी; आज रेशमी साड़ियों और दुपट्टों पर।
राजस्थान की ऐप्लिक कढ़ाई, जिसमें सुनहरे/चाँदी रंग के रिबन (गोटा) को काटकर कपड़े पर सिला जाता है। हल्की और चमकदार — दुल्हन की ओढ़नी और मेहंदी के कपड़ों में लोकप्रिय।
कच्छ (गुजरात) और राजस्थान की रंगीन कढ़ाई जिसमें छोटे शीशे टाँके जाते हैं — चनिया-चोली, गरबा और संगीत की पोशाक में।
लहरिया लहर जैसी धारियों वाली बाँधकर-रंगने की कला है; बंधेज/बंधनी बिंदुओं वाली। दोनों दूल्हे के साफ़े और दुल्हन की ओढ़नी में आम हैं।
05ख़रीदारी
सिल्क मार्क ऑर्गनाइज़ेशन ऑफ़ इंडिया (केंद्रीय रेशम बोर्ड, वस्त्र मंत्रालय द्वारा स्थापित) का लेबल शुद्ध रेशम का आश्वासन देता है। रेशम की बड़ी ख़रीद पर यह लेबल माँगें।
हथकरघा पर बने कपड़े की पहचान के लिए सरकारी लेबल। पावरलूम की बनी 'बनारसी-जैसी' साड़ियाँ बाज़ार में आम हैं — बिल पर 'हैंडलूम' लिखवाएं।
GI बताता है कि उत्पाद उस क्षेत्र की पारंपरिक विधि से बना है। अधिकृत उपयोगकर्ता (authorised user) ही GI नाम से बेच सकते हैं — विक्रेता से पूछें।
हैंडलूम में उल्टी ओर धागों के सिरे और हल्की अनियमितता दिखती है; पावरलूम एकदम समान होता है। रेशम के धागे का 'बर्न टेस्ट' (जले बालों जैसी गंध, राख) केवल एक ढीले धागे पर करें — यह संकेत है, प्रमाण नहीं।
कीमतें कपड़े, बुनाई, ज़री और कारीगरी पर बहुत निर्भर करती हैं, इसलिए हम कोई मूल्य नहीं बताते। कम से कम तीन दुकानों से लिखित कोटेशन लें और बिल पर कपड़ा, ज़री और हैंडलूम/पावरलूम का प्रकार लिखवाएं।
06देखभाल
हर रस्म के लिए हर व्यक्ति का पहनावा — परिवार वस्त्र चेकलिस्ट से एक जगह ट्रैक करें।